Frank Rosenblatt's Perceptron: The 1958 Invention That Quietly Built the AI Future
फ्रैंक रोसेनब्लैट: वो जीनियस जिसने 1958 में AI का भविष्य लिखा, और फिर भुला दिया गया
परिचय: आधुनिक मशीन में छिपा भूत
आज हम सब ChatGPT जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से घिरे हुए हैं। यह हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इस आधुनिक मशीन के अंदर एक पुराना भूत छिपा है—एक ऐसा विचार जो दशकों पहले मर गया था, पर आज हमारी सबसे नई तकनीक को चला रहा है।
क्या होगा अगर हम आपसे कहें कि आज के AI के पीछे का मुख्य विचार 1958 में एक भूले-बिसरे जीनियस द्वारा खोजा गया था, जिसके काम को दशकों तक दफ़ना दिया गया? यह कहानी फ्रैंक रोसेनब्लैट की है, जिनकी सोच एक ऐसे भूत की तरह है जो अपनी मौत के कई साल बाद आख़िरकार सच साबित हो रही है। यह लेख उस क्रांति के पीछे के पाँच आश्चर्यजनक सत्यों को उजागर करेगा जिसने हमारी दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।
1. डीप लर्निंग का जनक यह सोचकर मर गया कि वह असफल हो गया था
फ्रैंक रोसेनब्लैट, एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, को "डीप लर्निंग का जनक" कहा जाता है। उन्होंने परसेप्ट्रॉन (Perceptron) का आविष्कार किया—एक इलेक्ट्रॉनिक मस्तिष्क जो जैविक सिद्धांतों पर आधारित था और सीखने की क्षमता रखता था। 1950 के दशक में, उनके आविष्कार को लेकर जबरदस्त उत्साह था। लोगों को लगा कि सोचने वाली मशीन का जन्म हो गया है।
लेकिन आलोचकों ने, विशेष रूप से मार्विन मिंस्की और सेमुर पैपर्ट ने, अपनी प्रभावशाली 1969 की पुस्तक परसेप्ट्रॉन्स के माध्यम से, उनकी पूरी शोध की दुनिया को तबाह कर दिया। मिंस्की ने बाद में स्वीकार किया कि उन्हें इस किताब को लिखने के लिए एक "चिकित्सीय मजबूरी" (therapeutic compulsion) महसूस हुई थी, ताकि वे उस चीज़ को खत्म कर सकें जिसे वे एक "समग्र ग़लतफ़हमी" मानते थे। इस आलोचना ने "AI विंटर" की शुरुआत की, एक ऐसा दौर जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अनुसंधान के लिए फंडिंग लगभग पूरी तरह से सूख गई। उस समय, AI का क्षेत्र छोटा था और कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों के विचारों का वर्चस्व था, इसलिए इस आलोचना ने पूरे क्षेत्र को लगभग एक दशक के लिए रोक दिया।
1971 में अपने 43वें जन्मदिन पर, रोसेनब्लैट की एक नाव दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गई। वह यह देखे बिना ही दुनिया से चले गए कि उनका काम एक दिन सही साबित होगा। अपने जीवन के अंत में, उनका शोध प्रशिक्षित चूहों के मस्तिष्क के पदार्थ को अप्रशिक्षित चूहों में इंजेक्ट करने पर केंद्रित हो गया था, जो उनके मूल भव्य दृष्टिकोण से एक दुखद बदलाव का संकेत देता था।
2. पूरी AI क्रांति एक हाई स्कूल प्रतिद्वंद्विता की देन थी
यह एक ऐतिहासिक विडंबना है कि फ्रैंक रोसेनब्लैट और उनके प्रमुख आलोचक, मार्विन मिंस्की, दोनों द ब्रॉन्क्स हाई स्कूल ऑफ़ साइंस के स्नातक थे। यह कल्पना करना लगभग असंभव है कि AI के दो केंद्रीय, विरोधी दर्शन—जो 60 से अधिक वर्षों तक एक खरबों डॉलर के उद्योग को परिभाषित करेंगे—दो किशोरों के दिमाग से निकले जो एक ही स्कूल के गलियारों में चलते थे।
उनकी प्रसिद्ध बौद्धिक लड़ाई—कनेक्शनिज़्म बनाम सिम्बॉलिक AI—एक ऐसी प्रतिद्वंद्विता थी जो प्रतीकात्मक रूप से उनके स्कूल के हॉल में शुरू हुई और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य को तय कर गई। टास्केड (Taskade) के संस्थापक जॉन ज़ी इसे "ब्रॉन्क्स साइंस माफ़िया" कहते हैं—ब्रॉन्क्स के दो किशोर जिन्होंने अनजाने में AI का भविष्य लिख दिया। उनकी प्रतिद्वंद्विता के परिणाम पर एक शक्तिशाली टिप्पणी है:
मिंस्की यह देखने के लिए काफी समय तक जीवित रहे कि जिस "बंद गली" को उन्होंने खारिज कर दिया था, वह दुनिया पर छा गई।
3. आधुनिक AI का "मस्तिष्क" 1958 में पंच कार्ड से बनाया गया था
जुलाई 1958 में, परसेप्ट्रॉन का एक अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। यह 5-टन के IBM 704 कंप्यूटर पर चला। पंच कार्डों के साथ केवल 50 परीक्षणों के बाद, मशीन ने स्पष्ट रूप से प्रोग्राम किए बिना बाईं ओर चिह्नित कार्डों को दाईं ओर चिह्नित कार्डों से अलग करना सीख लिया। यह एक क्रांति थी—एक मशीन उदाहरणों से सीख रही थी।
यह मौलिक सिद्धांत आज ChatGPT जैसे आधुनिक AI सिस्टम के प्रशिक्षण की नींव है। लेकिन रोसेनब्लैट का सपना सिर्फ पैटर्न पहचानने से कहीं बड़ा था। उन्होंने 1958 में ही अपने आविष्कार के विशाल दृष्टिकोण का वर्णन किया था:
"...एक ऐसी मशीन जो बिना किसी मानवीय प्रशिक्षण या नियंत्रण के अपने परिवेश को देखने, पहचानने और पहचानने में सक्षम हो।"
4. AI की असली उत्पत्ति: उलझा हुआ मानव मस्तिष्क, न कि उत्तम तर्क
रोसेनब्लैट एक मनोवैज्ञानिक थे, न कि केवल एक कंप्यूटर वैज्ञानिक। उनका लक्ष्य एक तर्क मशीन बनाना नहीं था, बल्कि यह समझना था कि मानव मस्तिष्क कैसे काम करता है। उनका "कनेक्शनिस्ट" मॉडल (यानी, मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की तरह कनेक्शन से सीखने वाला मॉडल) जैविक सिद्धांतों पर आधारित था, जैसे यादृच्छिक न्यूरल कनेक्शन। यह उस समय के प्रमुख "सिम्बॉलिक" AI दृष्टिकोण (यानी, इंसानों द्वारा लिखे गए तार्किक नियमों पर आधारित मॉडल) के बिल्कुल विपरीत था।
रोसेनब्लैट का मानना था कि धारणा जन्मजात नहीं होती, बल्कि सीखी जाती है। उन्होंने इसे शक्तिशाली रूप से व्यक्त किया:
"एक जीव जो दृश्य तंत्र से पूरी तरह सुसज्जित है, और मान लीजिए, वर्गों और वृत्तों के वातावरण के संपर्क में है, वह इन आकृतियों के बीच तब तक अंतर नहीं बता पाएगा जब तक कि उसने विशेष रूप से ऐसा करना सीखा न हो।"
यही जैविक, संभाव्य दृष्टिकोण—जिसे कभी खारिज कर दिया गया था—अंततः विजयी हुआ और आज के AI को शक्ति प्रदान करता है।
5. उनका 70 साल पुराना सपना अभी भी अधूरा है: AI जो काम करे
जॉन ज़ी के अनुसार, मौजूदा AI सिस्टम, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs), शक्तिशाली "भविष्यवाणी" इंजन हैं, लेकिन उनमें एक स्वाभाविक, एकीकृत "निष्पादन" (execution) परत की कमी है। वे जानकारी उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन वे कार्यों को पूरा करने के लिए दुनिया में एक व्यवस्थित तरीके से कार्य करने के लिए नहीं बने हैं।
यह वह महत्वपूर्ण टुकड़ा है जो रोसेनब्लैट के मूल दृष्टिकोण को पूरा करने के लिए गायब है: ऐसी मशीनें जो अपने वातावरण में स्वायत्त रूप से कार्य कर सकती हैं। उनका 1958 का सपना केवल सोचने वाली मशीनों का नहीं, बल्कि काम करने वाली मशीनों का था। यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण AI के भविष्य से सीधा जुड़ता है। अगली बड़ी छलांग AI को एक "उपकरण" से एक "टीम के साथी" में बदलना है जो केवल भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि कार्यों को निष्पादित भी करता है।
निष्कर्ष: एक भूले हुए विचार की गूंज
फ्रैंक रोसेनब्लैट की कहानी एक भूले-बिसरे अग्रणी, उनके शानदार विचार जो अपने समय से दशकों आगे था, और उस मानवीय नाटक की है जिसने एक तकनीकी क्रांति को आकार दिया। उनका काम हमें याद दिलाता है कि महान विचार अक्सर गलत समझे जाते हैं और उन्हें अपना समय आने तक इंतजार करना पड़ता है।
परसेप्ट्रॉन को ChatGPT में विकसित होने में लगभग 70 साल लगे। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है: "आज कौन से अन्य क्रांतिकारी विचार निष्क्रिय पड़े हैं, जो बस अपने क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं?"
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